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Monday, 27 February 2012

कितने स्वार्थी हुए

भटक रहा समाज ,
गिरते नैतिक मूल्य ,
हर मर्यादा टूटी ,
मानवता कर रही रुदन ,
पुरातन परम्पराओं ,
की जल रही हैं चिताएं ,
आधुनिकता का लबादा ओढे हर कोई ,
छल , दंभ , कपट का जीवन जीते हम ,
झूटे अहम् को स्वाभिमान का नाम दिया ,
कितने स्वार्थी हुए हम ,
तोड़कर मर्यादा के बंधन ,
झूठ के पर्वत पर उदित करा रहे ,
प्रगति का सूर्य ,
गीत राम के गाते ,
कर्म रावण के ,
कैसा विरोधा भासी हुआ जीवन

विनोद भगत
 

Sunday, 26 February 2012

नीड़

प्रकृति का जीव ,
 सुन्दर उपहार  है नीड़ ,
नीड़ कवच है ,
जीवन  का ,
नीड़ प्रकृति की ,
सुन्दर कला कृति ,
जीवन का प्रथम,
 सत्य नीड़ ,
कहीं घौसला कहीं मकान ,
पर क्या नीड़ की उपयोगिता ,
 समझ पाया मानव ,
अपने ही हाथों से तोड़ता ,
अपने ही नीड़ को ,
नीड़ केवल तिनकों , ईट पत्थरों से ,
बने घर का ही नाम नहीं ,
नीड़ नाम है आशा का ,
नीड़ नाम है यथार्थ का ,
यथार्थ है नीड़ के प्रति निष्ठा का ,
आस्था  का ,
नीड़ जहाँ तुम निवास करते हो ,
उस सकल राष्ट्र  का ,
नाम है नीड़ ,
और तुम मात्र तिनका हो ,
इस नीड़ का ,
यही यथार्थ है ,
यथार्थ से मुख मोड़कर ,
नीड़ के तिनके तिनके ,
अलग अलग कर ,
ये क्या कर रहे हो ,
तनिक विस्मृति से बहार आओ ,
देखो पाँव भी तुम्हारा है ,
 और कुहाड़ी भी तुम्हारे हाथ में है ,
कोई और क्यों ,
अपने कर्म का , तुम ही फैसला करो ,
स्मरण इतना ही रहे ,
 नीड़ कवच है जीवन का

                           विनोद भगत

 

Wednesday, 22 February 2012

कही अनकही मेरा एक छोटा सा प्रयास है , मैं सभी मित्रों से निवेदन करता हूँ कि मुझे मेरी कमियों से अवगत कराएं ताकि मैं इसमे सुधार कर सकूँ

Tuesday, 21 February 2012

खुद सुधरो


आओ समाज को बदलें ,
आओ लोगो को बदलें ,
आओ सदाचार सिखाएं ,
आओ उपदेश दें ,
आओ सत्य का प्रचार करें ,
आओ दुनिया को नैतिकता का पथ दिखाएँ ,
आओ स्वामी बन कर प्रवचन दें ,
तभी आवाज आयी,
जाओ ...... पहले खुद को सुधार लो ,
तब यह सब करना ,
खुद सुधरोगे सब कुछ बदल जाएगा ,
जो चाहते हो वह सब मील जाएगा
                       विनोद भगत

मैं क्यों लिखता हूँ ,


मैं क्यों लिखता हूँ ,
सच तो यह है ,
कि मैं खुद भी नहीं जानता ,
विचारों  को शब्दों में ढाल कर ,
कुछ कहने की कोशिश करता हूँ ,
मैं कुछ नया नहीं गढ़ता ,
वही जो पहले भी सुना औए लिखा होता है ,
वही सब स्मरण कराता हूँ ,
मैं नहीं जानता मेरे लिखने से क्या होगा ,
पहले भी बहुत कुछ लिखा गया है ,
उसका क्या कोई सार्थक परिणाम हुआ ,
शायद नहीं ,
लोग पढ़ते  रहे ,
कुछ तारीफ़ के पुल गढ़ते रहे ,
जीवन में कौन उतार पाया ,
अच्छी बाते पढने में अच्छी लगती है ,
अमल कब हो पता है ,
शायद इसीलिए मैं सोचता हूँ ,
मैं क्या और क्यों लिखता हूँ ,
पर लिखना मेरा कर्म है ,
फल की इच्छा ना करूँ ,
तो लिखना जारी रहेगा ,


               विनोद भगत

Monday, 20 February 2012

आम आदमी


आम आदमी मुझसे िब्गड़ गया ,
बुरा भला कहने लगा ,
गुस्से में मुझे घूरने लगा ,
लाल पीली ऑंखें िदखाता ,
बोला गाली मत देना ,
आज तो कह िदया ,
आगे से कभी मुझे ,
नेताजी मत कहना ,
जो मेरी कमाई खाता है ,
उसे मेरे बराबर मत बनाना
                  विनोदभगत

Sunday, 19 February 2012

मधुर स्मर्तिया


भर आयी ये आँखे ,
जब कहा उन्होंने , चलते हैं ,
यकबायक ठहर गया ,
वक्त , जब कहा उन्होंने ,
चलते हैं ,
रुंधे गले से बस इतना ,
कह पाए ,
जाओ पर तुम अपनी ,
मधुर स्म्रतियों को ,
हमारे अन्तःस्थल से कैसे ,
ले जा पाओगे ,
हाँ स्मर्तिया , जिन पर ,
अब तुम्हारा कोई ,
अधिकार नहीं ,
वह सब हमारी निधियां है ,
जिन्हें संजोये रखेंगे ,
हम अपने ह्रदय में ,
इसलिए कि कभी वे तुम्हारी थी ,
जाओ ले जाओ ,
हमारी हृदयस्पर्शी भावनाएं ,
जिनमें सिर्फ शुभकामनाओं ,
कि विशाल आकांक्षाएं है ,
तुम्हारे लिए .

विनोद भगत