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बदल गए है संबंधों के अर्थ , अर्थ के लिए बन रहे है सम्बन्ध , व्यर्थ हो गए सभी सम्बन्ध , अर्थ है तो सम्बन्ध भी है , अर्थ का यह कैसा हु...
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मैं छूना चाहता हूँ , तुम्हें , कुछ इस तरह कि, छूने का अहसास , भी होने पायें तुम्हें , क्योंकि , तुम मेरी खामोश चाहत का , मंदिर...
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नमस्कार , मै समाजसेवक , आपकी सेवा के लिए सदा तत्पर , कहिये , आपकी क्या समस्या है , अरे हाँ आराम से , मेरे चमचमाते मार्बल के फर्श से बचन...
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मैं नया नया इस शहर में आया था। पहली पोस्टिंग थी। बड़ी मुश्किल से एक कमरा मिला। उसमें भी कई प्रतिबंध नौ बजे बाद नहीं आओगे, लाइट फालतू नहीं जल...
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मैं नया नया इस शहर में आया था। पहली पोस्टिंग थी। बड़ी मुश्किल से एक कमरा मिला। उसमें भी कई प्रतिबंध नौ बजे बाद नहीं आओगे, लाइट फालतू नहीं ज...
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मै स्वप्न खरीदने निकला , एक दिन , स्वप्नों के बाज़ार में , बड़ी भीड़ थी , ठसाठस भरे थे खरीदार , रंगीले स्वप्न , रसीले स्वप...
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आओ समाज को बदलें , आओ लोगो को बदलें , आओ सदाचार सिखाएं , आओ उपदेश दें , आओ सत्य का प्रचार करें , आओ दुनिया को नैतिकता का...
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ज़मीन नफ़रत की , और खाद मिलायी दंगों की , वोट की फसल पाने के लिए , हकीकत यही है सियासत में घुस आये नंगों की , सत्ता मिलते ही एकदम , ...
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पेट में उनके आग होती है , जिनके चूल्हे बुझे होते हैं , बुझे चूल्हे की आग पेट से , जब बाहर निकलती है , तब विकराल हो जाती है , चूल्हे...
Monday, 10 June 2013
Saturday, 8 June 2013
उत्तर दो ,
उर में वेदना है गहरी ,
नयनों के अश्रु हुए शुष्क ,
अधरों से शब्द नहीं छूट रहे ,
कलरव खगों का हुआ मौन ,
प्रकृति की मनोरम छटा खोज रहा मै ,
अरे , यह कौन निर्मम हैं ,
जिसने रौद दिया कोमल मन को ,
यह कौन है जिसने बदले आदर्श ,
छद्म आदर्शों की
मृग मरीचिका के पीछे भागने की परम्परा ,
किस दुर्बुद्धि ने की शुरू ,
मौन नहीं साधो ,
उत्तर दो ,
मानवता क्यों कर रही क्रंदन ,
उत्तर दो ,
विनोद भगत
Thursday, 6 June 2013
बस्तियों में
बस्तियों में क़ानून हो गया जंगल का,
जंगल की व्यवस्था अब बदलनी होगी,
फर्क कैसे हो बस्ती और जंगल के बीच,
एक बहस इस बात पर भी करनी होगी,
जानवर सा ही लगने लगा है आदमी,
सूरत जानवर की अब बदलनी होगी, अफ़सोस क्यों अपने कर्मों का करें अब ,
गौरव की नहीं शर्म गाथाएँ लिखनी होगी
बस्तियों में क़ानून हो गया जंगल का,
जंगल की व्यवस्था अब बदलनी होगी,
विनोद भगत
Tuesday, 4 June 2013
एक कहानी बड़ी पीड़ाभरी
एक कहानी बड़ी पीड़ाभरी है मेरे देश की ,
मगर आंसू नहीं आते किसी की आँखों में ,
संवेदनाएं तो मृत हो चुकी हैं मेरे देश की ,
रोज़ ही होती मानवता की नृशंस हत्या ,
आँखें तो बंद हैं क़ानून की मेरे देश की
सरेआम लुट जाती हैं अस्मतें यहाँ रोज़ ,
है इन्साफ की आस में बेटी मेरे देश की
है कौन सा नीच कर्म जिसमे नहीं लिप्त
भूल गए गौरवमयी थातियाँ मेरे देश की
विनोद भगत
मगर आंसू नहीं आते किसी की आँखों में ,
संवेदनाएं तो मृत हो चुकी हैं मेरे देश की ,
रोज़ ही होती मानवता की नृशंस हत्या ,
आँखें तो बंद हैं क़ानून की मेरे देश की
सरेआम लुट जाती हैं अस्मतें यहाँ रोज़ ,
है इन्साफ की आस में बेटी मेरे देश की
है कौन सा नीच कर्म जिसमे नहीं लिप्त
भूल गए गौरवमयी थातियाँ मेरे देश की
विनोद भगत
Saturday, 18 May 2013
अंतहीन तलाश
ठाकुर ,ब्राहमण ,दलित , यादव,
और भी ना जाने कौन ,
मेरे देश में सभी मिलते हैं ,
नहीं मिलता तो एक आदमी नहीं मिलता ,
मैं तलाश रहा हूँ एक आदमी ,
,गुजराती पंजाबी , मराठी , पहाड़ी .
यह सब भी मिलते हैं मेरे देश में ,
नहीं मिलता तो एक हिंदुस्तानी ,
मैं तलाश रहा हूँ एक हिंदुस्तानी ,
हिन्दू , मुस्लिम ईसाई और सिख भी ,
मेरे देश में मिलते हैं ,
मै ढूढ़ रहा हूँ एक इंसान ,
नेता ,अभिनेता , समाजसेवक भी ,
मेरे देश में आसानी से मिलते हैं ,
मैं ढूंढ़ रहा हूँ एक भला मानुष ,
मेरी तलाश जारी है अभी भी ,
शायद अंतहीन तलाश
विनोद भगत
समाजसेवक ,
नमस्कार , मै समाजसेवक ,
आपकी सेवा के लिए सदा तत्पर ,
कहिये , आपकी क्या समस्या है ,
अरे हाँ आराम से , मेरे चमचमाते मार्बल के फर्श से बचना ,
कहीं फिसल ना जाना ,
मेरे गले सोने की चेन देख रहे हो भाई ,
यह सब मेरी समाजसेवा का ही फल है ,
सच में समाजसेवा में बड़ा आनंद है ,
आप बताएं ,मै आपके लिए क्या कर सकता हूँ ,
वह बोला , समस्या मेरी आप शायद ही सुलझा पाओ ,
मै समाज सेवक , मुझको चुनौती दे रहे हो ,
तुम नहीं जानते बाहर खड़ी सफ़ेद रंग की महंगी गाडी ,
यह शानदार कोठी यह सब मैंने समाजसेवा से ही तो कमाया है ,
बड़े नेताओं और मंत्रियों तक मेरी पहुँच ,
सब समाजसेवा का ही तो प्रतिफल है ,
वह बोला , फिर भी तुम मेरी समस्या नहीं सुलझा सकते ,
आखिर कौन सी समस्या है , तुम्हारी ,
तुम जैसे समाजसेवक ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है ,
नहीं , नासूर है , तुम अपने आप को समाजसेवक कहलाना बंद कर दो ,
समाज का कुछ भला होगा ,
बताओ ,सुलझा पाओगे क्या ,
कल तक तुम्हारी गिनती उठाईगीरों में होती थी ,
आज तुम समाज सेवक हो गए हो ,
दरअसल यही तो बड़ी समस्या है ,
दूर कर पाओगे ,
मै निरुत्तर था ,
वह कहे जा रहा था ,
समाजसेवक सुने जा रहा था ,
विनोद भगत
आपकी सेवा के लिए सदा तत्पर ,
कहिये , आपकी क्या समस्या है ,
अरे हाँ आराम से , मेरे चमचमाते मार्बल के फर्श से बचना ,
कहीं फिसल ना जाना ,
मेरे गले सोने की चेन देख रहे हो भाई ,
यह सब मेरी समाजसेवा का ही फल है ,
सच में समाजसेवा में बड़ा आनंद है ,
आप बताएं ,मै आपके लिए क्या कर सकता हूँ ,
वह बोला , समस्या मेरी आप शायद ही सुलझा पाओ ,
मै समाज सेवक , मुझको चुनौती दे रहे हो ,
तुम नहीं जानते बाहर खड़ी सफ़ेद रंग की महंगी गाडी ,
यह शानदार कोठी यह सब मैंने समाजसेवा से ही तो कमाया है ,
बड़े नेताओं और मंत्रियों तक मेरी पहुँच ,
सब समाजसेवा का ही तो प्रतिफल है ,
वह बोला , फिर भी तुम मेरी समस्या नहीं सुलझा सकते ,
आखिर कौन सी समस्या है , तुम्हारी ,
तुम जैसे समाजसेवक ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है ,
नहीं , नासूर है , तुम अपने आप को समाजसेवक कहलाना बंद कर दो ,
समाज का कुछ भला होगा ,
बताओ ,सुलझा पाओगे क्या ,
कल तक तुम्हारी गिनती उठाईगीरों में होती थी ,
आज तुम समाज सेवक हो गए हो ,
दरअसल यही तो बड़ी समस्या है ,
दूर कर पाओगे ,
मै निरुत्तर था ,
वह कहे जा रहा था ,
समाजसेवक सुने जा रहा था ,
विनोद भगत
काला धन ,
भारत एक सांस्कृतिक देश है ,
नेताजी बोल रहे थे ,
पत्रकार बोले ,नेताजी काला धन ,
देश की सबसे बड़ी समस्या है ,
आप क्या कहेंगे इस बारे में ,
नेताजी आग बबूला हो गए ,
पत्रकारों पर आँखें तरेरी ,
गुस्से से बोले ,
आप इस पावन देश की संस्कृति को प्रदूषित कर रहे हैं ,
इस वैदिक और सांस्कृतिक देश में धन लक्ष्मी जी होती हैं ,
और आप लक्ष्मीजी को काला कह रहे हो ,
इसीलिए धन (लक्ष्मीजी ) हमारे पास है ,
आप धन कमाने को पाप कहते हो ,
कैसे अधर्मी हो ,
धर्म का पालन करो , धन की पूजा करो ,
धन के लिए कुछ भी करो ,
तभी लक्ष्मीजी प्रसन्न होंगी ,
आईंदा काला धन कभी मत कहना ,
धन तो धन है ,
हम तो धन की यानी लक्ष्मीजी की इज्ज़त करते हैं ,
तभी तो बेहतर ज़िन्दगी जीते हैं ,
विनोद भगत
नेताजी बोल रहे थे ,
पत्रकार बोले ,नेताजी काला धन ,
देश की सबसे बड़ी समस्या है ,
आप क्या कहेंगे इस बारे में ,
नेताजी आग बबूला हो गए ,
पत्रकारों पर आँखें तरेरी ,
गुस्से से बोले ,
आप इस पावन देश की संस्कृति को प्रदूषित कर रहे हैं ,
इस वैदिक और सांस्कृतिक देश में धन लक्ष्मी जी होती हैं ,
और आप लक्ष्मीजी को काला कह रहे हो ,
इसीलिए धन (लक्ष्मीजी ) हमारे पास है ,
आप धन कमाने को पाप कहते हो ,
कैसे अधर्मी हो ,
धर्म का पालन करो , धन की पूजा करो ,
धन के लिए कुछ भी करो ,
तभी लक्ष्मीजी प्रसन्न होंगी ,
आईंदा काला धन कभी मत कहना ,
धन तो धन है ,
हम तो धन की यानी लक्ष्मीजी की इज्ज़त करते हैं ,
तभी तो बेहतर ज़िन्दगी जीते हैं ,
विनोद भगत
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