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बदल गए है संबंधों के अर्थ , अर्थ के लिए बन रहे है सम्बन्ध , व्यर्थ हो गए सभी सम्बन्ध , अर्थ है तो सम्बन्ध भी है , अर्थ का यह कैसा हु...
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मैं छूना चाहता हूँ , तुम्हें , कुछ इस तरह कि, छूने का अहसास , भी होने पायें तुम्हें , क्योंकि , तुम मेरी खामोश चाहत का , मंदिर...
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नमस्कार , मै समाजसेवक , आपकी सेवा के लिए सदा तत्पर , कहिये , आपकी क्या समस्या है , अरे हाँ आराम से , मेरे चमचमाते मार्बल के फर्श से बचन...
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मैं नया नया इस शहर में आया था। पहली पोस्टिंग थी। बड़ी मुश्किल से एक कमरा मिला। उसमें भी कई प्रतिबंध नौ बजे बाद नहीं आओगे, लाइट फालतू नहीं जल...
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मैं नया नया इस शहर में आया था। पहली पोस्टिंग थी। बड़ी मुश्किल से एक कमरा मिला। उसमें भी कई प्रतिबंध नौ बजे बाद नहीं आओगे, लाइट फालतू नहीं ज...
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मै स्वप्न खरीदने निकला , एक दिन , स्वप्नों के बाज़ार में , बड़ी भीड़ थी , ठसाठस भरे थे खरीदार , रंगीले स्वप्न , रसीले स्वप...
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आओ समाज को बदलें , आओ लोगो को बदलें , आओ सदाचार सिखाएं , आओ उपदेश दें , आओ सत्य का प्रचार करें , आओ दुनिया को नैतिकता का...
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ज़मीन नफ़रत की , और खाद मिलायी दंगों की , वोट की फसल पाने के लिए , हकीकत यही है सियासत में घुस आये नंगों की , सत्ता मिलते ही एकदम , ...
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पेट में उनके आग होती है , जिनके चूल्हे बुझे होते हैं , बुझे चूल्हे की आग पेट से , जब बाहर निकलती है , तब विकराल हो जाती है , चूल्हे...
Sunday, 13 October 2013
क्षमा करो हे माँ
हरितवसना सुमधुर गंधा पीयूष जननी हे ध्ररा ,
नव रस नव जीवन दायिनी क्षमा करो हे माँ ,
है नादान,अबोध मानव बन रहा आत्मघाती
कर
प्रकृति का अपमान बन रहा घोर अपराधी ,
तेरे
ही तो पुत्र है तू ही है माँ जगत्जननी
हरितवसना
सुमधुर गंधा पीयूष जननी हे ध्ररा ,
नव
रस नव जीवन दायिनी क्षमा करो हे माँ
विनोद
भगत
बाधाओं से ही लक्ष्य है पाना
अश्लथ ,अप्रतिहत अवधार्य कर्म असि आगे बढ़ते है जाना
कंटक पथ पद नग्न , पर अविराम तुझे चलते है जाना
बाधा पर्वत सी होती है ,साहस का मान रख चलता जा
लक्ष्य अर्जुन सा देखना, संधान करने से नहीं है घबराना
विराम विश्राम हैं कुटिल शत्रु, लक्ष्य संधान के पथ में ,
विचलित ना हो पथिक बाधाओं से ही लक्ष्य है पाना
विनोद भगत
हिन्दू इस देश के लिए खतरा
हिन्दू इस देश
के लिए खतरा बन गए ,
वोट के लिए
बलि का बकरा बन गए ,
मिल जुल के
रहने की आदत अब छूटी,
दरअसल राजनीति
का ककहरा पढ़ गए
मज़हब में सभी
के है प्यार के अक्षर बहुत ,
जाने क्यों
शब्द खून का कतरा बन गए ,
अपने स्वार्थ
की बातो पर खूब चिल्लाए ,
और मतलब की
बात पर बहरा बन गए
विनोद भगत
.............
Monday, 19 August 2013
अंधेरों से .......
अंधेरों से अब मुझे प्यार होने लगा है ,
इनमें उजालों का सुखद इन्तजार तो है ,
सुख के दिन अब रोज़ ही डराते हैं मुझे ,
दुःख की घड़ियाँ लगती करीब जो हैं ,
मिलन अब उतना नहीं भाता है मुझे ,
विरह की बेला दिखती सामने को है ,
कैसे कह दूं प्यार तुमसे है मुझे ,
मेरी खता का इन्तजार जमाने को है
विनोद भगत
Wednesday, 7 August 2013
आओ सृजन करें...............
आओ सृजन करें फिर से इस धरा पर मनोहर धाम का ,
सार्थक करें जन्म लेने का लक्ष्य जीवन है इसी काम का ,
उन्मुक्त गगन से सीख लें उच्च विचारों की उड़ान का ,
आओ लौट आयें अब भूला हुआ बनकर किसी शाम का ,
मर्यादा का करना है प्रतिस्थापन फिर से इस जगत में ,
सीख तो रावण से भी लें पर आदर्श अपनाएँ राम का ,
झूठ के महल खड़े बहुत कर लिए दुःख ही दुःख पाया
सतपथ का कठिन,पर अंत होगा सुखद परिणाम का ,
शताब्दियों के आदर्श एक पल में हो जाया करते हैं ख़ाक ,
बहुत कुछ अब करना होगा समय नहीं यह विश्राम का
आओ सृजन करें फिर से इस ध्ररा पर मनोहर धाम का ,
सार्थक करें जन्म लेने का लक्ष्य जीवन है इसी काम का ,
विनोद भगत
सार्थक करें जन्म लेने का लक्ष्य जीवन है इसी काम का ,
उन्मुक्त गगन से सीख लें उच्च विचारों की उड़ान का ,
आओ लौट आयें अब भूला हुआ बनकर किसी शाम का ,
मर्यादा का करना है प्रतिस्थापन फिर से इस जगत में ,
सीख तो रावण से भी लें पर आदर्श अपनाएँ राम का ,
झूठ के महल खड़े बहुत कर लिए दुःख ही दुःख पाया
सतपथ का कठिन,पर अंत होगा सुखद परिणाम का ,
शताब्दियों के आदर्श एक पल में हो जाया करते हैं ख़ाक ,
बहुत कुछ अब करना होगा समय नहीं यह विश्राम का
आओ सृजन करें फिर से इस ध्ररा पर मनोहर धाम का ,
सार्थक करें जन्म लेने का लक्ष्य जीवन है इसी काम का ,
विनोद भगत
Sunday, 21 July 2013
हिमालय की पुकार
सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,
प्रगति के नाम पर कब तक होगी नादानी ,
रोकना है विनाश , और प्रलय घमासान ,
प्रकृति की रक्षा करने वालो के विचार चुनो ,
सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,
जंगल काटते रहे और पानी को रोकते रहे ,
कितना वैभव और सुख देती वसुंधरा हमको ,
जागो रे जागो कृतघ्नों सा मत व्यवहार करो ,
सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो
विनोद भगत
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,
प्रगति के नाम पर कब तक होगी नादानी ,
रोकना है विनाश , और प्रलय घमासान ,
प्रकृति की रक्षा करने वालो के विचार चुनो ,
सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,
जंगल काटते रहे और पानी को रोकते रहे ,
कितना वैभव और सुख देती वसुंधरा हमको ,
जागो रे जागो कृतघ्नों सा मत व्यवहार करो ,
सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो
विनोद भगत
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