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Sunday, 13 October 2013

ज़मीन नफ़रत की ,

ज़मीन नफ़रत की ,
और खाद मिलायी दंगों की ,
वोट की फसल पाने के लिए ,
हकीकत यही है
सियासत में घुस आये नंगों की ,
सत्ता मिलते ही एकदम ,
कैसे सूरत औ सीरत
बदल जाती है वोट के भिखमंगो की ,
चेहरों पर इनके ना जाना ,
दीखतेहै ये जरुर इंसानों से 
करम और हरकतें हैं भुजंगों की 
घूम रहे कई लायक सड़कों पर ,
क्या करें विवश है करने को चाकरी ,
राजनीति में मौज मनाते लफंगों की ,
                              विनोद भगत


क्षमा करो हे माँ


हरितवसना सुमधुर गंधा पीयूष जननी हे ध्ररा ,
नव रस नव जीवन दायिनी क्षमा करो हे माँ ,
है नादान,अबोध मानव बन रहा आत्मघाती 
कर प्रकृति का अपमान बन रहा घोर अपराधी ,
तेरे ही तो पुत्र है तू ही है माँ जगत्जननी 
हरितवसना सुमधुर गंधा पीयूष जननी हे ध्ररा , 
नव रस नव जीवन दायिनी क्षमा करो हे माँ 
विनोद भगत

बाधाओं से ही लक्ष्य है पाना



अश्लथ ,अप्रतिहत अवधार्य कर्म असि आगे बढ़ते है जाना
 
कंटक पथ पद नग्न , पर अविराम तुझे चलते है जाना
 
बाधा पर्वत सी होती है ,साहस का मान रख चलता जा
 
लक्ष्य अर्जुन सा देखना, संधान करने से नहीं है घबराना 
विराम विश्राम हैं कुटिल शत्रु, लक्ष्य संधान के पथ में ,
विचलित ना हो पथिक बाधाओं से ही लक्ष्य है पाना 
विनोद भगत

हिन्दू इस देश के लिए खतरा

हिन्दू इस देश के लिए खतरा बन गए ,
वोट के लिए बलि का बकरा बन गए ,
मिल जुल के रहने की आदत अब छूटी,
दरअसल राजनीति का ककहरा पढ़ गए
मज़हब में सभी के है प्यार के अक्षर बहुत ,
जाने क्यों शब्द खून का कतरा बन गए ,
अपने स्वार्थ की बातो पर खूब चिल्लाए ,
और मतलब की बात पर बहरा बन गए
                                     विनोद भगत .............


Monday, 19 August 2013

अंधेरों से .......

अंधेरों से अब मुझे प्यार होने लगा है ,
इनमें उजालों का सुखद इन्तजार तो है ,
सुख के दिन अब रोज़ ही डराते हैं मुझे ,
दुःख की घड़ियाँ लगती करीब जो हैं ,
मिलन अब उतना नहीं भाता है मुझे ,
विरह की बेला दिखती सामने को है ,
कैसे कह दूं प्यार तुमसे है मुझे ,
मेरी खता का इन्तजार जमाने को है

विनोद भगत

Wednesday, 7 August 2013

आओ सृजन करें...............

आओ सृजन करें फिर से इस धरा पर मनोहर धाम का ,
सार्थक करें जन्म लेने का लक्ष्य जीवन है इसी काम का ,
उन्मुक्त गगन से सीख लें उच्च विचारों की उड़ान का ,
आओ लौट आयें अब भूला हुआ बनकर किसी शाम का ,
मर्यादा का करना है प्रतिस्थापन फिर से इस जगत में ,
सीख तो रावण से भी लें पर आदर्श अपनाएँ राम का ,
झूठ के महल खड़े बहुत कर लिए दुःख ही दुःख पाया
सतपथ का कठिन,पर अंत होगा सुखद परिणाम का ,
शताब्दियों के आदर्श एक पल में हो जाया करते हैं ख़ाक ,
बहुत कुछ अब करना होगा समय नहीं यह विश्राम का
आओ सृजन करें फिर से इस ध्ररा पर मनोहर धाम का ,
सार्थक करें जन्म लेने का लक्ष्य जीवन है इसी काम का ,
विनोद भगत

Sunday, 21 July 2013

हिमालय की पुकार

सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,

क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,

प्रगति के नाम पर कब तक होगी नादानी ,

रोकना है विनाश , और प्रलय घमासान ,

प्रकृति की रक्षा करने वालो के विचार चुनो ,

सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,

क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,

जंगल काटते रहे और पानी को रोकते रहे ,

कितना वैभव और सुख देती वसुंधरा हमको ,

जागो रे जागो कृतघ्नों सा मत व्यवहार करो ,

सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,

क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो

विनोद भगत