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Saturday, 20 April 2013

दरिंदों की सभा


बड़ा गंभीर विचार
दरिंदों की सभा में,
होने लगा था ,
सारे दरिन्दे चिंता में थे ,
अरे ये क्या हो रहा है ,
आदमी हमारी बराबरी पर है ,
हमारी जात पर भीषण ख़तरा है ,
आओ हम सब मिलकर एक हो जाए ,
आदमी को उसकी असली औकात बताएं ,
एक दरिन्दे को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजें ,
यह क्या आदमी के पास जाने के लिए
तैयार नहीं था कोई दरिंदा ,
सब डर रहे थे ,
आखिर कौन जाएगा आदमी के पास ,
सारे दरिन्दे इसी सोच में डूबे थे ,
दरिंदों के चेहरों पर आदमी का खौफ ,
साफ़ नज़र आ रहा था ,
आदमी जो दरिंदों से डरता था ,
आज उसी आदमी के नाम से ,
दरिंदों की हवा संट थी ,
दरिंदें , बहुत परेशान हैं ,
आदमी का क्या करें ,

विनोद भगत

Thursday, 4 April 2013

गीत लिखा है मैंने ,


दर्द की स्याही से गीत लिखा है मैंने ,
वेदना को अपना मीत लिखा है मैंने ,
बड़ी लम्बी हो गयी है व्यथा की कथा,
ह्रदय की करुणा का संगीत दिया है मैंने,
दर्द में भी अनोखा स्वाद आने लगा है मुझे ,
तुम क्या जानो पीड़ा को जीत लिया है मैंने ,
जो पूछते हो मुस्कराता हूँ क्यों हर दम मैं ,
हर हाल में जीवन जीना सीख लिया है मैंने
दर्द की स्याही से गीत लिखा है मैंने ,
वेदना को अपना मीत लिखा है मैंने ,
विनोद भगत

Tuesday, 2 April 2013

सूर्य अस्त ,पहाड़ मस्त ,

म्यर पहाडक ज्वानों
सुण लिया यक बात ,
शराब पिबेर नि करो
जवानी अपणी बरबाद ,
शराबक लिजी किलें बदनाम
करौन्छां अपणी भुमी ,
अब बदल दिया भागि ,
पहाडेक पहाडीक परिभाषा ,
सूर्य अस्त ,पहाड़ मस्त ,
कुनी वालोंक मूख बंद कर दिया अब ,
हाथ जोडबेर विनती छु हमरी ,
द्य्खें दिया अब सबुकें ,
बतें दिया अब सबुकें ,
जो यस कौल ,
वीक मुखम जलि लाकड़ लगे दिया ,
पर शराब अब पिन छोड़ दिया ज्वानो

विनोद भगत