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Monday, 10 June 2013

यह कैसी उन्नति


कच्चे घरों में रिश्ते ,
होते थे पक्के ,
अफ़सोस कि अब ,
घर तो पक्के हैं ,
पर रिश्ते कच्चे हो गए हैं ,
कच्ची सडकों पर उड़ती धूल ,
में कितना अपनापन था ,
अब डामर की काली सडकों ,
से नहीं हो पता संवाद भी ,
खेतों में जब उगा करती थी केवल फसल ,
अब तो फ़्लैट उगने लगे खेतों में भी ,
गैस के चूल्हे का बेस्वाद भोजन ,
बूढी दादी के बनाए मिटटी के चूल्हे ,
में बनी रोटी का अलौकिक स्वाद अब कहाँ रहा ,
हफ़्तों बाद पहुचती चिट्ठियों में उमड़ता प्यार ,
एक सपना मात्र हैं ,
मोबाईल के एस एम एस में कहाँ होता है प्रेम का अंश ,
भाव तो हर चीज़ के बढ़ रहे है ,
पर "भाव" अब कहाँ रहे ,
सच में क्या हम उन्नति कर रहे हैं ,
पर कैसी उन्नति ,

विनोद भगत

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