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Sunday, 21 July 2013

हिमालय की पुकार

सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,

क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,

प्रगति के नाम पर कब तक होगी नादानी ,

रोकना है विनाश , और प्रलय घमासान ,

प्रकृति की रक्षा करने वालो के विचार चुनो ,

सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,

क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो ,

जंगल काटते रहे और पानी को रोकते रहे ,

कितना वैभव और सुख देती वसुंधरा हमको ,

जागो रे जागो कृतघ्नों सा मत व्यवहार करो ,

सुनो रे , सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो ,

क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो

विनोद भगत

भक्ति का मार्ग

तुम मेरे पास श्रद्धा से आते ,
मैं श्रद्धा और भक्ति का भूखा हूँ ,
पर तुम तो अपना वैभव दिखाने आने लगे ,
तुम ही तो कहते हो , मैं सबको देता हूँ ,
मैं सर्वशक्तिमान हूँ , मुझमें समूचा जग समाया है ,
पर तुम तो मुझे ही दिखाने लगे अपनी तुच्छ शक्ति ,
धन धान्य मुझसे पाकर मुझे ही देने लगे ,
भूल गए मैंने तुम्हें इस योग्य बनाया ,
हाँ , मैंने बनाया इसलिए कोई दीन ना रहे ,
एक भी दीन जब तक है ,
मैं कैसे प्रसन्न रह सकता हूँ ,
बुद्धिमान कैसे कहूँ तुम्हें ,
तुम समझ नहीं पाए मुझे ,
नहीं जान पाए मेरा मंतव्य ,
मुझे प्रसन्न करने की झूठी कोशिश करते रहे ,
मैं संहारक भी हूँ ,
सृष्टि का सृजन भी मैंने ही किया है ,
पर , तुम समझ बैठे स्वयं को निर्माता ,
सच में तुम कितने मूर्ख बुद्धिमान हो ,
मुझे नहीं चाहिये तुम्हारा धन ,
मेरी बनाई सृष्टि के निर्माण से प्रेम करो ,
सच कहूँ यही है मेरी भक्ति का मार्ग ,
विनोद भगत

Saturday, 13 July 2013

आग सीने मे--------

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आग सीने में कब तक दबाएँ रहें हम,
आओ जला दें अब अन्याय के महल ,
खामोशी को विरोध की मशाल बनाएं ,
खुद ही मसीहा बन करनी होगी पहल,
आग सीने में कब तक दबाएँ रहें हम,
उनके ज़ुल्मों की अब हो गयी इन्तहां ,
सुनो शास्त्र नहीं अब शस्त्र उठाने होंगे ,
ईमान की आंधी से सीने जाएँ दहल
आग सीने में कब तक दबाएँ रहें हम,
खून के आंसू रुलाने वालोँ ख़बरदार ,,
हमारी शांति लाएगी एक दिन तूफ़ान ,
हर ज़ुल्म का हिसाब लेंगे पल पल ,
आग सीने में कब तक दबाएँ रहें हम,

विनोद भगत

अपने आप उजड़ रहे हैं

रिश्तो की ठोस बर्फ अब कहाँ ,
संबंधों के ग्लेशियर पिघल रहे हैं ,
लिहाजों की नहीं कोई जगह अब ,
वर्जनाओं के पर्वत उधड रहे हैं ,
देवी मानते हैं कितना नारी को अब ,
अखबारों में रोज़ ही पढ़ रहे हैं ,
आदर्शों की रोज़ होली जलाते अब ,
वीभत्स कहानियां ही गढ़ रहे हैं ,
भावनाओं की लगातार होती ह्त्या ,
प्रगति के कैसे सोपान चढ़ रहे हैं,
दोष हमारा ही है अपराधी भी हम ,
अपना कसूर किसके माथे मढ़ रहे हैं ,
किसी ने नहीं किया यह कब सोचेंगे ,
हां खुद ही अपने आप उजड़ रहे हैं ,

विनोद भगत ,

तस्वीर बदल जाये

सभी तो धार्मिक हैं यहाँ ,
या दावा करते हैं धार्मिक होने का ,
फिर भी पाप बढ़ रहा है ,
अत्याचार बढ़ रहा है ,
और मै ढूढ़ रहा हूँ धर्म ऐसा ,
जिसमें पाप और अत्याचार ,
अनाचार का समर्थन हो ,
लोग झूठ बोलते हैं ,
किसी भी धर्म में नहीं है ,
पाप अनाचार का समर्थन ,
या मुझे नहीं मिल पाया वह धर्म ,
नहीं पढ़ पाया उस धर्म के सिद्धांत ,
हर धर्म में नीति की ही बात है ,
पर कोई नहीं मानता नीति की बातें ,
पता नहीं धर्म की बातों के विपरीत ,
क्यों जाते हैं सब ,
किसी धर्म की किताब ऐसी भी होनी चाहिए ,
जिसमें अनीति की बातें हों ,
सबको वही पढनी चाहियॆ ,
किताब में पढ़ी बातों पर अमल कौन करता है ,
तब शायद तस्वीर बदल जाये

विनोद भगत

कोई पूछेगा इन भगवानों से


भगवान् ही भगवान् ,
चारों ओर भगवान् ,
फिर भी आपदा ,
फिर भी अन्याय ,
फ़ैल रहा अत्याचार ,
कोई पूछेगा इन भगवानों से ,
भीड़ के बीच गोरे मुख ,
मुख पर लम्बा सा तिलक ,
अधरों पर मोहक पर कुटिल मुस्कान ,
माया त्यागने का प्रवचन ,
खुद माया मोह में डूबे ये भगवान् ,
कोई पूछेगा इन भगवानों से ,
कड़ी सुरक्षा में ये भगवान् ,
किसका डर है इन्हें ,
भगवान् की सुरक्षा में इन्सान ,
इन्सान की कौन करेगा सुरक्षा ,
कोई पूछेगा इन भगवानों से ,
भगवान् तो कुटिया में रहते है ,
आलिशान महलों में रहने वाले ये भगवान् ,
हे भगवान् , ये कैसे भगवान् ,
नित नए नए बढ़ते भगवान् ,
कब अवतरित होगा एक इन्सान ,
कोई पूछेगा इन भगवानों से ,

विनोद भगत

Thursday, 4 July 2013

छलावों की मृगतृष्णा

चूल्हे पर पानी भी पकाते है कुछ लोग
दरअसल रोज़ छले जाते हैं कुछ लोग ,
बेदर्दों की दुनिया से सीख ली है उन्होंने ,
बच्चों को भूखे ही सुलाते हैं कुछ लोग
छलावों की मृगतृष्णा नियति है जिनकी ,
अच्छे की आस में मर जाते है कुछ लोग
खाली पेट में इंसानियत नहीं पनपती ,
इसीलिए हैवान बन जाते हैं कुछ लोग ,
चूल्हे पर पानी भी पकाते है कुछ लोग
दरअसल रोज़ छले जाते हैं कुछ लोग ,

विनोद भगत