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Sunday, 13 October 2013

क्षमा करो हे माँ


हरितवसना सुमधुर गंधा पीयूष जननी हे ध्ररा ,
नव रस नव जीवन दायिनी क्षमा करो हे माँ ,
है नादान,अबोध मानव बन रहा आत्मघाती 
कर प्रकृति का अपमान बन रहा घोर अपराधी ,
तेरे ही तो पुत्र है तू ही है माँ जगत्जननी 
हरितवसना सुमधुर गंधा पीयूष जननी हे ध्ररा , 
नव रस नव जीवन दायिनी क्षमा करो हे माँ 
विनोद भगत

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