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Saturday, 13 July 2013

अपने आप उजड़ रहे हैं

रिश्तो की ठोस बर्फ अब कहाँ ,
संबंधों के ग्लेशियर पिघल रहे हैं ,
लिहाजों की नहीं कोई जगह अब ,
वर्जनाओं के पर्वत उधड रहे हैं ,
देवी मानते हैं कितना नारी को अब ,
अखबारों में रोज़ ही पढ़ रहे हैं ,
आदर्शों की रोज़ होली जलाते अब ,
वीभत्स कहानियां ही गढ़ रहे हैं ,
भावनाओं की लगातार होती ह्त्या ,
प्रगति के कैसे सोपान चढ़ रहे हैं,
दोष हमारा ही है अपराधी भी हम ,
अपना कसूर किसके माथे मढ़ रहे हैं ,
किसी ने नहीं किया यह कब सोचेंगे ,
हां खुद ही अपने आप उजड़ रहे हैं ,

विनोद भगत ,

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