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Tuesday, 4 June 2013

एक कहानी बड़ी पीड़ाभरी

एक कहानी बड़ी पीड़ाभरी है मेरे देश की ,
मगर आंसू नहीं आते किसी की आँखों में ,
संवेदनाएं तो मृत हो चुकी हैं मेरे देश की ,
रोज़ ही होती मानवता की नृशंस हत्या ,
आँखें तो बंद हैं क़ानून की मेरे देश की
सरेआम लुट जाती हैं अस्मतें यहाँ रोज़ ,
है इन्साफ की आस में बेटी मेरे देश की
है कौन सा नीच कर्म जिसमे नहीं लिप्त
भूल गए गौरवमयी थातियाँ मेरे देश की

विनोद भगत

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