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Friday, 26 October 2012

गांधी आ गए स्वप्न में ,

आज गांधी आ गए स्वप्न में ,
चेहरे पर दर्द के भाव थे ,
पीड़ा भरे स्वर में बोले ,
मै रास्ट्रपिता हूँ क्या इसी देश का ,
लाठी हो के भी बिना लाठी के लड़ा ,
क्या इसी देश के लिए ,
मेरे हाथ में नोट देखकर ले लिया ,
तस्वीर देख कर आखों में नमी भर आयी ,
अरे यह क्या ,
हर घोटाले हर भ्रष्टाचार में मेरा भी चित्र पहले आता है ,
एक और आन्दोलन करना होगा ,
मत कहो मुझे रास्ट्रपिता ,
मिटा दो मेरी तस्वीर नोट से ,
जहाँ ,भूख , भ्रष्टाचार , बेरोजगारी पलती हो ,
जहाँ दो वक़्त की रोटी के लिए जिस्म बिकते हों ,
मै वहां का रास्ट्रपिता हूँ ,
जहां देशी भाषा का अपमान होता हो ,
जहाँ रिश्तों का भी मोल लगता हो ,
मेरे नाम का भी सौदा होता हो ,
चश्मा उतार कर आँखों को पोछने लगे बापू ,
रुधे गले से बोले ,
इतना दर्द तो तब नहीं हुआ मुझे जब ,
प्रार्थना सभा में गोली लगी ,
मै सत्य कहता हूँ ,
आज वह दर्द महसूस हुआ है ,
और इतना बड़ा झूठ ,
अब भी कहते हैं ,
मेरे देश के लोग ,
मेरा भारत महान ,
यह कैसी महानता है ,
कई प्रश्नों का जवाब लिए बिना ,
बापू ना जाने कहाँ चले गए ,
मै निरूत्तर , शर्मिन्दा सा ,
नींद से जगा ,
बापू के प्रश्नों का,
जवाब ढूढ़ रहा हूँ

copyright@विनोद भगत

Wednesday, 24 October 2012

कभी कभी

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
खाने में जब तेरे सर का बाल आता है ,
गुस्सा नाक पर कुछ यूँ चला आता है ,
उफनते दूध में ज्यों उबाल आता है
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है ,
ओ मेरी हथिनी , ओ मेरी गजगामिनी ,
यूँ ना चलो मेरे इस सरकारी मकान में ,
तुम्हारे कदमो से यहाँ भूचाल आता है
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है ,
शापिंग को चलती हो जब भी तुम साथ ,
तुम्हारे लिए ना जाने क्या क्या मिलता है ,
हमारे आंसुओं के लिए बस रुमाल आता है
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
विनोद भगत(

जड़ों से बिछड़ने की कीमत


कंधे पर बस्ता ,
हाथों में गुलेल ,
लौट कर आते थे ,
पाठशाला से ,
धूल भरी पगडण्डी ,
पैरों में रबर की चप्पलें ,
बेतरतीब बाल ,
किनारे के पेड़ो पर ,
कभी चढ़ जाना ,
चिड़िया के घोसले में ,
ना जाने क्या तलाशना ,
पाठशाला के मास्साब को देख कर ,
छुप जाना , पतली मजबूत डंडियों के हाथों पर निशान,
अठखेली करते मस्ती से घर पहुचना ,
सच कितना आनंद था ,
अब तो अकल्पनीय लगता है यह सब ,
चकाचक चमकते जूते,
झकाझक कपडे ,
गले में टाई,
पीठ पर बस्ते का बोझ ,
बस के भीतर की घुटन ,
मास्साब नहीं , सर का बेगानापन ,
अब पढने में मज़ा नहीं आता ,
फिर कब मिलेगी वो पतली डंडियों की मार ,
पगडंडियों का अपनापन ,
काली डामर की सड़कों से,
जुड़ नहीं पाया कभी नाता ,
अ आ के बदले ए बी से शुरुआत ,
हमें अपनी ही संस्कृति से ,
बिछोह के रास्ते पर ले जाती ,
जड़ों से बिछड़ने की कीमत चुकानी पड़ेगी ,
नहीं हम जड़ों से बिछड़ने की कीमत तो ,
चुका ही रहे हैं ,

कापीराईट @विनोद भगत

घोटाले का पेड़ ,


पैसा पेड़ पर नहीं लगता ,
गलत,
पैसा अब पेड़ पर ही लगता है ,
एक पेड़ होता है ,
घोटाले का पेड़ ,
भारत में विकसित एक नई प्रजाति का वृक्ष ,
बहुत तेजी से बढता है ,
ख़ास तौर से नेताओं के वहां तो वृद्धि दर तीव्र है इसकी ,
प्रजाति के अलग अलग नाम है ,
टू जी , कॉमनवेल्थ , कोलगेट,
जाने कितने नाम है जी ,
हाँ , आम आदमी इस पेड़ को लगा ही नहीं सकता ,
केवल इसके बारे में सुन सकता है ,
वह तो जो उगाता है ,
उसकी भी कीमत नहीं पाता है ,
आम आदमी चमत्कृत हो सकता है ,
यह सुनकर कि घोटाले का पेड़ होता है ,
पैसा पेड़ पर ही लग रहा है ,
आम अमरुद के पेड़ से पैसा कैसा ,
घोटाले का पेड़ लगाओ ,
पैसा ही पैसा पाओ

विनोद भगत

कैसे लिखू.....


कैसे लिखू गीत मैं श्रृंगार के ,
तुम ही बताओं जरा ,
जब जल रहा हो देश ,
भूख और बेबसी के अंगार में ,
क्रंदन हो , रुदन हो , आर्तनाद हो ,
बाला के पायल की झंकार में ,
अमानवीयता का बोलबाला हो ,
मानवता आंसू बहा रही हो कहीं भंगार में ,
कैसे लिखूं मैं गीत श्रृंगार के ,
तुम ही बताओं ज़रा ,
धर्म , जाती के नाम पर विभाजन का विष ,
वोट के लिए खून बहाना ,
बहाना बना देश सेवा का ,
गीत लिखूंगा मैं , पर ठहरो अभी ,
श्रृंगार का नहीं यह समय ,
अभिसार का नहीं यह समय ,
समय है शब्द क्रान्ति का ,
शब्दों ने बदला है इतिहास ,
एक निवेदन छिपा है ,
मेरे इस इनकार में ,
कैसे लिखूं गीत मै श्रृंगार के
copyright@विनोद भगत

तुम कौन हो


अभिलाष लिए प्रीत की ,नयन निहार रहे पथ

अभिसार को आतुर ,प्रिय से मिलने को उन्मत्त

शब्द भी मादक मादक ,प्रेम की पराकाष्ठाएं

प्रेम ग्रन्थ की नायिका लज्जा के आभूषण सजाये

ह्रदय में फूटे प्रेम के अंकुर ,आमंत्रण के स्वर भी मौन है ,

रूप के अनंत सागर में उतराती हिलोरे लेती यह कौन है

चंचल कामिनी सी किस कवि का प्रेम गीत हो

या तुम कान्हा की बांसुरी का मधुर संगीत हो

विनोद भगत

सबसे बड़ी आपदा


लाशें गिनकर मुआवजा हम देंगे ,
आपदा की क्यों चिंता करते हो ,
हम हैं तो सही , जिन्दे को भूखा रख देंगे ,
गिनते जाओ लाशें दर लाशें ,
हमारा खजाना भरा है ,
यहाँ जिन्दा रहने पर कुछ नहीं मिलेगा ,
हम आखिर सरकार है , फर्ज अपना ,
पूरा निभायेंगे , आपदा प्रबंधन नहीं कर पाए तो क्या ,
तुम्हारे मरने पर शोक जताएंगे ,
आपदा राहत के मद का भी उपयोग करना है ,
नहीं तो , वह पैसे भी लेप्स हो जायेंगे ,
दो आंसू दिखावे के तो बहायेंगे ,
आखिर जनता के प्रति भी तो फर्ज निभायेंगे ,
आपदा तो दैवीय है , हम इन्सान क्या कर पायेंगे ,
मत घबराओ , मत शोर मचाओ ,
तुम ही ने तो हम जैसी आपदा को पैदा किया ,
हम सबसे बड़ी आपदा हैं ,
हमसे नहीं घबराए , तो अब किससे डरते हो ,
लाशें गिनकर मुआवजा हम देंगे ,
आपदा की क्यों चिंता करते हो ,

कापीराईट @विनोद भगत

पेट की आग


पेट में उनके आग होती है ,
जिनके चूल्हे बुझे होते हैं ,
बुझे चूल्हे की आग पेट से ,
जब बाहर निकलती है ,
तब विकराल हो जाती है ,
चूल्हे की आग से ज्यादा ,
पेट की आग तेजी से भड़कती है ,
इस पेट की आग को और मत भड़काओ ,
पेट की भड़की आग सब कुछ भस्म कर देगी ,
पेट सबके पास होता है ,
पेट में चूल्हा जब जलेगा ,
हर घर से उठेगा धुंए का गुबार ,
उस गुबार में कुछ नजर नहीं आयेगा ,
चारो और गुबार ही गुबार ,
धुएं के इस गुबार में ,
सभ्यता का खेल ख़त्म हो जाएगा ,
तब संघर्ष, भीषण संघर्ष होगा ,
सभ्यताएं और मानवताएं तब सिसकेंगी ,
पेट में आग मत भड़काओ ,
चूल्हों की आग जलाओ ,
चूल्हों की आग जलाओ ,
चूल्हों को मत बुझने दो ,
चूल्हों को मत बुझने दो ,

कापीराईट @विनोद भगत

हे , कृष्ण , तुम फिर आ जाओ


हे , कृष्ण , तुम फिर आ जाओ ,
पर अबकी बार कई है द्र
ौपदियां ,
साड़ी बहुत सी लेकर आना ,
और हाँ , लाखों है अब कंस यहाँ ,
पुतनाओं की तो भरमार है ,
अफ़सोस अर्जुन युधिस्ठिर सरीखे मित्र सखा ,
अब शायद ना मिल पायें ,
मिल भी जाएँ तो फटेहाल ही मिलेंगे ,
मै तुम्हें बुला तो रहा हूँ ,
और मुझे यह भी पता है ,
तुम भी अब दुर्योधन के साथी साबित कर दिए जाओगे ,
हाँ, अब यही होता है यहाँ ,
तुम्हें भागना पढ़ सकता है ,
तुम्हारा गीता ज्ञान पढ़ते तो हैं ,
पर अनुसरण दुर्योधन और कंस का करते हैं ,
सोच रहा हूँ ,
तुम्हें आने से रोक दूं ,
पर नहीं ,
तुम एक बार आ जाओ ,
आकर देख जाओ ,
आओगे ना तुम ,
हे क्रष्ण तुम फिर आ जाओ

copyright@ विनोद भगत

बदल रहा है ज़माना

बदल रहा है ज़माना , यह हमने माना ,
रिश्तों की बदली बदली परिभाषा,
बुन रहे अब नफ़रत का ताना बाना ,
तोड़ दिए हैं अब प्रेम के सभी साज़ ,
कैसे गायें अब मधुरता का तराना ,
बदल रहा है ज़माना , यह हमने माना ,
अपने ही दे रहे चोट दर चोट ,
किसे कहें अपना , कौन है बेगाना ,
रस्मो रिवाज़ भूल कर सभी ग़ुम हो गए ,
नयी हो गयी राहें भी, यह हमने जाना ,
बदल रहा है ज़माना , यह हमने माना ,
कोई किसी के लिए नहीं रोता ,
अब कोई किसी का नहीं बनता ,
आसान है हाथ छोड़कर बीच राह में ,
और कितना मुश्किल है साथ निभाना
बदल रहा है ज़माना , यह हमने माना ,

copyright@विनोद भगत
"

" आरक्षण आरक्षण

आओ, मैं तुम्हें खाउंगा ,
मैं आरक्षण हूँ ,
रक्षण नहीं, भक्षण करता हूँ ,

सपनो का , अरमानों का ,
देखो मेरा दम ,
योग्य जो है उसे अयोग्य बना देता हूँ ,
अयोग्य को प्रश्रय देता हूँ ,
तुम असहाय हो ,
एक पल में बता देता हूँ ,
मुझे सरंक्षण है ,
वोट के सौदागरों का ,
मै जानता हूँ ,
तुम नहीं कर सकते कुछ भी ,
मैं अट्टहास कर रहा हूँ ,
मुझे सींच रहे हैं तुम्हारे नीति नियंता ,
दरअसल सवर्ण होना अभिशाप बन गया है ,
तुम्हारे लिए ,
तुम सवर्ण हो ,
इसलिए शर्म आनी चाहिए तुम्हें ,
सवर्ण कहीं के ,
गाली बन गया है ,
अब सवर्ण शब्द ,
हाँ, तुम सवर्ण हो , सवर्ण हो ........
 
कापीराईट @विनोद भगत
"
.

प्यार नफ़रत


इस भागती ज़िन्दगी में प्यार के लिए फुरसत नहीं मिलती,
ना जाने फिर भी लोग नफ़रत का वक़्त कैसे निकाल लेते हैं ,
नहीं मुक्कम्मल जिंदगी जीने का जिनके पास सलीका ,
वोह , कितनी आसानी से मौत का सामान निकाल लेते हैं ,
खुद को आईने मे देखकर खुद ही खुद पर इतराते रहते है
बिना देखे दूसरों में ना जाने कैसे नुख्स निकाल लेते हैं
वफ़ा करना जिनकी फितरत में नहीं कभी दोस्तों ,
यारों को अपने कैसे बेवफा कह दिल से निकाल लेते हैं ,

कापीराईट @विनोद भगत

पैसा नहीं आत्मीयता

सुनो भाई ,
कोई तो सुनो ,
मै भी पैसे वाला बनूंगा ,

और जब मै पैसे वाला ,
बहुत सारे पैसे वाला बन जाउंगा ,
तब भी, मुझे तुम ऐसे ही स्नेह दोगे ,
अरे , स्नेह के बदले पैसा दूंगा ,
तुम मेरी वाह वाह करना ,
उसके भी पैसे दूंगा ,
मै पैसे से सम्मान खरीदूंगा ,
मै पैसे के लिए कहीं तक भी गिर जाउंगा ,
पर तुम तो फिर भी मेरा सम्मान ही करोगे ,
आंखिर मै पैसे वाला हूँ ,
पैसे के बदले मुझे तुम अपनी आत्मीयता भी दोगे ,
मै जानता हूँ , अच्छी तरह जानता हूँ ,
मै तुम्हारी आत्मीयता नहीं खरीद पाउँगा ,
पैसा मुझे तुम्हारी आत्मीयता से दूर कर देगा ,
सोच रहा हूँ , मै ऐसे ही ठीक हूँ ,
मुझे पैसे से ज्यादा आपकी आत्मीयता प्रिय है ,
हाँ सोच लिया ,
मै पैसे वाला नहीं,
केवल तुम्हारा मित्र बने रहना चाहूँगा ,
तुम मेरे मित्र हो ,
इससे बड़ा धन और क्या होगा
विनोद भगत
"

दहलीजें,

दहलीजें,
अब नहीं होती घरो में ,
इसीलियें,
मर्यादाएं भी टूट रही हैं ,
दहलीज़ लांघने का,
एक मतलब होता था ,
अब दहलीज़ ही नहीं
तो मतलब भी ख़तम
दहलीजें जो संस्कृति का ,
वाहक थी ,
दहलीजों पर उकेरे ,
जाते आलेखन ,
घर की सांस्कृतिक ,
पहचान का परिचय होता था ,
दहलीज़ सीमा होती थी ,
अब सीमाओं से परे हो गए हैं हम ,
दहलीज़ को भुला दिया है ,,
बार लांघने के बजाय दहलीज़ को ,
हटा दिया ,
अब मर्यादाओं के टूटने का कोई डर नहीं

विनोद भगत
"

प्रतिभा तो घर में ही रहेगी ,


भई वाह ,
क्या खूब लिखते हो ,
आम आदमी की पीड़ा पर कलम चलाते हो ,
पहनावे से तो तुम ऐसे ही लगते हो ,
क्या शानदार रचना लिखते हो ,
मेरी प्रशंसा से क्यों सकुचाते हो ,
तुम्हें लिखना चाहिए , लगातार लिखो,
प्रतिभा छुपी नहीं रहनी चाहिए ,
उसे बाहर निकालो ,
अब उसने भी मुह खोला ,
देखिये बाबूजी ,
प्रतिभा तो घर में ही रहेगी ,
और आप पता नहीं क्या क्या अनाप शनाप बके जा रहे हैं ,
आप लोगो ने हमारी जेबें तक तो खाली करा ली ,
अब घरवाली को भी घर से निकालोगे ,
हाँ , लाओं, मेरे महीने के हिसाब का पर्चा तो दे दो ,
लाला गड़बड़ कर देगा ,
इस पर्चे को देख कर पता नहीं आप क्या बडबडा रहे हो ,
दाल , आटे का बढता भाव और सिलेंडर के दाम लिखे हैं इस पर ,
आप पता नहीं क्या समझ रहे हो ,
पप्पू की फीस और घर के राशन का हिसाब,
यह तो हम रोज़ ही लिखते पढते और समझने की कोशिश में हैं ,
पर अब तक नहीं समझे ,
आप समझे क्या ,

कापीराईट @ विनोद भगत

शब्द


शब्द अमृत हैं कभी , शब्द विष भी होते हैं
शब्द प्राण हैं तो शब्द मृत्यु भी होते हैं
शब्द सम्बन्ध, तो शब्द बिखराव भी होते हैं
शब्द अपने हैं , शब्द पराये भी होते हैं
शब्द ख़ास हैं , शब्द आम भी होते हैं
शब्द मित्र हैं , शब्द शत्रु भी होते हैं
शब्द धरती हैं , शब्द आकाश भी होते हैं
शब्द बनाव हैं , शब्द बिगाड़ भी होते हैं ,
शब्द सत्य हैं , शब्द झूठ भी होते हैं ,
शब्द शब्द हैं , शब्द नि :शब्द भी होते हैं
शब्द बचाव हैं , शब्द नाशवान भी होते हैं ,
शब्द दानव हैं , शब्द भगवान् भी होते हैं ,
शब्द प्राणवान हैं , शब्द मारक भी होते हैं ,
कापीराईट @विनोद भगत

असहाय लोग ,



सुलगते सवालों के बीच ,
धधकते समाज के साथ ,
जी रहे असहाय लोग ,
धुंआ धुंआ होते अरमानों ,
की लाश पर बेजार रोते ,
मरते हुए जी रहे असहाय लोग ,
नित जीने की आशा दिखाते ,
रोज़ पैदा हो रहे मसीहाओं के फुस्स होते ,
आंदोलनों के भंवर में फसे ,
ना जाने कैसे जी रहे असहाय लोग ,
अरबों के वारे न्यारे हो रहे यहाँ ,
बेदर्दों की हमदर्दी के दर्द से कराह रहे ,
बेहद पीड़ा है मन में
फिर भी जी रहे असहाय लोग ,
सुलगते सवालों के बीच ,
धधकते समाज के साथ ,
जी रहे असहाय लोग ,
विनोद भगत