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Wednesday, 24 October 2012

हे , कृष्ण , तुम फिर आ जाओ


हे , कृष्ण , तुम फिर आ जाओ ,
पर अबकी बार कई है द्र
ौपदियां ,
साड़ी बहुत सी लेकर आना ,
और हाँ , लाखों है अब कंस यहाँ ,
पुतनाओं की तो भरमार है ,
अफ़सोस अर्जुन युधिस्ठिर सरीखे मित्र सखा ,
अब शायद ना मिल पायें ,
मिल भी जाएँ तो फटेहाल ही मिलेंगे ,
मै तुम्हें बुला तो रहा हूँ ,
और मुझे यह भी पता है ,
तुम भी अब दुर्योधन के साथी साबित कर दिए जाओगे ,
हाँ, अब यही होता है यहाँ ,
तुम्हें भागना पढ़ सकता है ,
तुम्हारा गीता ज्ञान पढ़ते तो हैं ,
पर अनुसरण दुर्योधन और कंस का करते हैं ,
सोच रहा हूँ ,
तुम्हें आने से रोक दूं ,
पर नहीं ,
तुम एक बार आ जाओ ,
आकर देख जाओ ,
आओगे ना तुम ,
हे क्रष्ण तुम फिर आ जाओ

copyright@ विनोद भगत

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