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Friday, 17 February 2012

धार्मिक बहू


ससुर चारपाई पर सोया ,
खांसी से बेदम पड़ा था ,
कब से िच्ल्ला रहा था ,
बहू एक कप चाय दे दे ,
बहू गुस्से से भुनभुनाते बोली ,
बुड्डा चैन से जीने नहीं देता ,
बहू का कार्यकम तय था ,
स्वामी जी का प्रवचन सुनने का ,
बहू बड़ी सुशील थी, बड़ी धार्मिक थी
पांच बजते ही पहुँच गयी ,
उस पंडाल में जहाँ स्वामी जी प्रवचन कर रहे थे
स्वामी जी बोल रहे थे , कानो में रस घोल रहे थे ,
बड़े -बुजुर्गो की सेवा सच्ची प्राथर्ना है ,
बहू बड़ी श्रधा से स्वामी जी का प्रवचन सुन रही थी
स्वामी जी के प्रवचनों पर झूम रही थी ,
कीतनी सुन्दर बाते बताते हैं स्वामी जी ,
स्वामी जी को श्रधा से नमन कर बहू लौटी ,
घर पर एक देह पड़ी थी , चारपाई पर ,
वही देह हीली , बहू एक ग्लास पानी तो देना ,
हे भगवन ,बूड़े े ने तो परेशां कर दीया ,
मरता भी तो नहीं , स्वामी जी के वहां से कीतनी थकी हूँ ,
थकी बहू पर जरा भी तो दया नहीं आती इस खूसट को ,
ऐसी धार्मिक बहू भाग्य से ही मिलती है
                                 विनोद भगत


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