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Friday, 17 February 2012

विकास हो रहा है ,


विकास हो रहा है ,
आज भी प्लेटफार्म पर कड़कती ठण्ड में ,
ठिठुरन भरी रात में फटे कम्बल में कोई सो रहा है ,
विकास हो रहा है ,
मैंने देखा एक रोटी के टुकड़े के लिए माँ की गोद में बच्चा ,
जार-जार रो रहा है ,
विकास हो रहा है ,
आज भी पेट की आग बुझाने को ,
पूरा शरीर बिक रहा है ,
विकास हो रहा है ,
पञ्च सितारा कक्षों में बैठकों में सड़क पर रहने वालो के भाग्य का ,
कोई फैसला हो रहा है ,
विकास हो रहा है ,
हाँ विकास हो रहा है ,
निरंतर इस बात का दावा हो रहा है ,
विकास हो गया तो उनके पास फिर काम ही क्या होगा ,
इसलिए विकास हो रहा है
                          विनोद भगत

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