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Friday, 17 February 2012

बँटवारा


धरती को बाँट दिया हमने ,
आओ सूरज का भी बँटवारा कर लें ,
क्या कहा बश में नहीं ,
हाँ , सही कहा ,
वश में होता तो सूरज को भी बाँट लेते ,
अपना अपना सूरज लेकर ,
गर्व से इठलाते ,
यह अलग बात है ,
अपने सूरज से जलकर ख़ाक भले ही हो जाते ,
पर सूरज को बांटते जरुर ,
जब धरती को बाँट कर ,
हम अपने ही लिए खोद रहे खाईयां ,
खुद ही उन खाईयों में गिरकर नेस्तनाबूद होते हुए भी ,
नहीं समझ रहे कि सही क्या है ,
गलत क्या है ,
पहचान हमारी मानव के रूप में थी ,
पर खुद को नहीं पहचान पा रहे हम ,
कहानियाँ सुनाई जाएँगी ,
इसी बँटी हुई धरती पर ,
सदियों पहले मानव होता था ,
अब मानव सरीखे तो दिखते हैं ,
पर मानवता दफ़न हो चुकी है ,
स्वार्थ ,लोलुपता , झूठे अहंकार के ,
राक्षस ने मानवता का भक्षण कर लिया ,
हाँ अब मानवता किताबों कि बात बन गयी है ,
                                  विनोद भगत

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