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Friday, 17 February 2012

मुन्नी बदनाम


मुन्नी बदनाम
शर्म के परदे अब .
उतार फेके हैं हमने ,
प्रगित के नाम पर,
मर्यादा के बंधन तोड़े ,
कैसा बेशर्मी का नंगा खेल है यह ,
मुन्नी' के बदनाम होने पर ,
ख़ुशी से नाचते, संगीत की स्वर लहिर्यो का ,
कैसा है यह अपमान ,
"मुन्नी जीसे पूजते थे , आज उसे बदनाम कर ,
गर्व से झूम रहे हम ,
"मुन्नी जो माँ है बहन हैं , बेटी है ,
उसकी बदनामी का ढोल बजा बजा कर नाच रहे हम ,
हम जो सीता , मीरा , सावित्री के आदर्शो पर इतराते है ,
वही मुन्नी की बदनामी पर आदर्शो की होली जला रहे हम ,
मुन्नी के बदनाम होने पर ,
ख़ुशी से नाचना ,
 तर्कसंगत है या शास्त्रसम्मत ,
 फुरसत कीसे है सोचने की ,
अभी तो नाच रहे है ख़ुशी से
आखीर मुन्नी बदनाम हुई है
                          विनोद भगत

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