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Monday, 27 February 2012

कितने स्वार्थी हुए

भटक रहा समाज ,
गिरते नैतिक मूल्य ,
हर मर्यादा टूटी ,
मानवता कर रही रुदन ,
पुरातन परम्पराओं ,
की जल रही हैं चिताएं ,
आधुनिकता का लबादा ओढे हर कोई ,
छल , दंभ , कपट का जीवन जीते हम ,
झूटे अहम् को स्वाभिमान का नाम दिया ,
कितने स्वार्थी हुए हम ,
तोड़कर मर्यादा के बंधन ,
झूठ के पर्वत पर उदित करा रहे ,
प्रगति का सूर्य ,
गीत राम के गाते ,
कर्म रावण के ,
कैसा विरोधा भासी हुआ जीवन

विनोद भगत
 

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